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विद्यालय संचालक और सरकार का सौतेला व्यवहार


सुनील उपाध्याय, बस्ती।


बस्ती।। स्वास्थ्य और शिक्षा मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं होती है |ऐसा लोग कहा करते हैं | परंतु यह कथन अब पुराना हो गया लगता है| सरकारी एजेंडे में भी स्वास्थ्य और शिक्षा की प्राथमिकता हुआ करती थी | जहां एक तरफ कोरोना महामारी के संक्रमण से देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं खोखली साबित हो रही हैं वही दूसरी तरफ शिक्षण संस्थाओं को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जीवन मरण का संघर्ष करना पड़ रहा है | शिक्षण संस्थानों में जो बड़ी-बड़ी इमारतें दिखाई पड़ती हैं उतने ही बड़े कर्ज के बोझ से भी वे लदे पड़े हैं | शिक्षक और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के वेतन, भवन और गाड़ियों के लोन की मासिक किस्तें, बिजली बिल, गाड़ियों के इंश्योरेंस और फिटनेस आदि खर्चों के बोझ से सभी संस्थान संकटग्रस्त हैं| लॉकडाउन के कारण वार्षिक परीक्षाएं नहीं हो पाई हैं और फरवरी माह के बाद से ही विद्यालय बंदी के अब तक 5 महीने पूरे होने को है | विगत सत्र 2019 -20 का शुल्क अधिकांश बच्चों का नहीं जमा हो पाया है | शुल्क जमा या ना जमा होने की अफवाहों से पिछले सत्र की फीस तो पूरी मिल ही नहीं पाई और नए सत्र 2020- 21 की भी अनिश्चितता बरकरार है | विद्यालय के शिक्षकों और संचालकों के सामने जीवन मरण का संकट का दौर जारी है | यहां तक कि राजस्थान में 9 विद्यालय संचालकों ने समस्या से हार कर अपना जीवन ही खो दिया है| लॉकडाउन अवधि के दौरान हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी, माननीया वित्त मंत्री जी और माननीय मुख्यमंत्री जी ने अपने किसी भी संबोधन में प्राइवेट शिक्षण संस्थानों का कोई भी जिक्र नहीं किया | सरकार की उपेक्षा से ऐसा लगता है कि प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोग इस देश के नागरिक ही नहीं है| उनका जीवन यापन व उनके बच्चों का भविष्य अधर में है और सरकार का ध्यान इन सभी पर बिल्कुल नहीं है | सरकार ऑनलाइन शिक्षा की बात करती है |लगभग 80% बच्चों के पास एंड्राइड मोबाइल उपलब्ध ना होने के कारण बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से भी वंचित हैं | ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था देने के लिए भी संस्थानों पर खर्च का बोझ पड़ता है |शिक्षकों को भी ऑफलाइन से अधिक समय देना पड़ता है |विद्यालयों की अर्थव्यवस्था इतनी जर्जर हो चुकी है कि अब ऑनलाइन व्यवस्था देने में भी अपने को असमर्थ महसूस कर रहे हैं |सरकार ने फीस जमा करने की गाइडलाइन तो जारी कर दी है परंतु शुल्क जमा होने की स्थिति बहुत खराब है | ऐसे में यदि सरकार वित्तविहीन शिक्षकों को लॉकडाउन अवधि के दौरान कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करती और विद्यालय संचालकों को आसान शर्तो एवं न्यूनतम ब्याज दर पर कर्ज मुहैया कराती तो संभव होता कि विद्यालय संचालक एवं शिक्षक भी इस संक्रमण काल में अपने अस्तित्व को बचा पाते |और सरकारों पर सौतेला व्यवहार का आरोप भी न लगता| शिक्षण व्यवस्था से जुड़े हुए सभी लोग निराश और हताश हैं यदि सरकार इनकी दैनिक स्थिति पर विचार नहीं करती है तोअधिकांश लोग जिनके पास जीवन जीने के दूसरे साधन नहीं है ,अपना जीवन खो देने को मजबूर होंगे |जिसकी जिम्मेदारी सरकारों पर ही होगी

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